कबीर परमेश्वर जी के विचार इनसे भी उच्च तथा श्रेष्ठ हैं। वे कहते हैं कि ऋषि शुकदेव भी आत्मज्ञानी नहीं था क्योंकि जब युवती शुकदेव के पलंग पर बैठी तो शुकदेव ने उसे स्त्राी समझकर अपने शरीर से छूने नहीं दिया और खड़ा होकर बाहर जाने की तैयारी कर दी। इससे स्पष्ट है कि शुकदेव जी को आत्म ज्ञान नहीं था। विचार करें कि यदि युवती के स्थान पर युवक बैठ जाता तो शुकदेव जी क्या करते? वे उससे कुशल-मंगल पूछते और पलंग छोड़कर खड़े नहीं होते। कहते कि भईया! पलंग एक ही है, आप पलंग पर
विश्राम करो, मैं नीचे पृथ्वी पर आसन लगा लेता हूँ। यदि युवक सभ्य होता तो कहता कि नहीं ऋषि जी! आप पलंग पर विराजो, मैं पृथ्वी पर विश्राम करूंगा। परंतु युवती होने के कारण ऋषि शुकदेव को
काम दोष के कारण भय लगा।
कबीर परमेश्वर जी ने बताया है कि स्त्राी तथा पुरूष आत्मा के ऊपर दो वस्त्र हैं। जैसे गीता अध्याय 2 श्लोक 22 में कहा कि अर्जुन! जीव शरीर त्यागकर नया शरीर धारण कर लेता है, इसे मृत्यु कहते हैं। यह तो ऐसा है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रा त्यागकर नए पहन लेता है। इसलिए आत्म तत्व को जान।
आज की तारीख में संत रामपाल जी महाराज ही तत्वज्ञान दिखा रहे हैं तथा उनके अनुसार शास्त्र विधि के साथ भक्ति करने से मुक्ति मिलती है तथा सतलोक में स्थान मिलता है सतगुरु रामपाल जी महाराज पूर्ण रूप से तत्वदर्शी संत हैं उनका ज्ञान छह शास्त्र 18 पुराण चार वेद मद्भागवत गीता कुरान बाइबल गुरु ग्रंथ साहब आदि सभी ग्रंथों से मेल खाता है और तत्वदर्शी संत की यही पहचान है कि वह शास्त्रों के अनुसार ही भक्ति मार्ग बताएं
जब तक यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तो जन-साधारण की धारणा होती है कि:-
1) बड़ा होकर पढ़-लिखकर अपने निर्वाह की खोज करके विवाह कराकर परिवार पोषण करेंगे। बच्चों को उच्च शिक्षा तक पढ़ाऐंगे। फिर उनको रोजगार मिल जाए। उनका विवाह करेंगे। परमात्मा संतान को संतान दे। फिर हमारा कर्तव्य पूरा हुआ। कई बार गाँव या गवांड (पड़ौसी गाँव) के वृद्ध इकट्ठे होते तो आपस में कुशल-मंगल जानते तो एक ने कहा कि परमात्मा की कृपा से दो लड़के तथा दो लड़की हैं। कठिन परिश्रम करके पाला-पोसा तथा पढ़ाया, विवाह कर दिया। सब के सब बेटा-बेटियों वाले हैं। मेरा कार्य पूर्ण हुआ। 75 वर्ष का हो गया हूँ। अब बेशक मौत हो जाए, मेरा जीवन सफल हुआ। वंश बेल चल पड़ी, संसार में नाम रहेगा।
1. मानव जीवन की आम धारणा | जीने की राह
जब तक यथार्थ आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता तो जन-साधारण की धारणा होती है कि:-
1) बड़ा होकर पढ़-लिखकर अपने निर्वाह की खोज करके विवाह कराकर परिवार पोषण करेंगे। बच्चों को उच्च शिक्षा तक पढ़ाऐंगे। फिर उनको रोजगार मिल जाए। उनका विवाह करेंगे। परमात्मा संतान को संतान दे। फिर हमारा कर्तव्य पूरा हुआ। कई बार गाँव या गवांड (पड़ौसी गाँव) के वृद्ध इकट्ठे होते तो आपस में कुशल-मंगल जानते तो एक ने कहा कि परमात्मा की कृपा से दो लड़के तथा दो लड़की हैं। कठिन परिश्रम करके पाला-पोसा तथा पढ़ाया, विवाह कर दिया। सब के सब बेटा-बेटियों वाले हैं। मेरा कार्य पूर्ण हुआ। 75 वर्ष का हो गया हूँ। अब बेशक मौत हो जाए, मेरा जीवन सफल हुआ। वंश बेल चल पड़ी, संसार में नाम रहेगा।
विवेचन:- उपरोक्त प्रसंग में जो भी प्राप्त हुआ, वह पूर्व निर्धारित संस्कार ही प्राप्त हुआ, नया कुछ नहीं मिला।
एक व्यक्ति का विवाह हुआ। संतान रूप में बेटी हुई। मानव समाज की धारणा रही है कि पुत्रा नहीं है तो उसका वंश नहीं चलता। (परंतु आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से पुत्रा-पुत्राी में कोई अंतर नहीं माना जाता) आशा लगी कि दूसरा पुत्र तो बेटा होगा। दूसरी भी लड़की हुई। फिर आशा लगी कि परमात्मा तीसरा तो पुत्रा दे। परंतु तीसरी भी लड़की हुई। इस प्रकार कुल पाँच बेटियाँ हुई। पुत्रा का जन्म हुआ ही नहीं। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि न तो मानव का चाहा हुआ और न किया हुआ। जो कुछ हुआ, संस्कारवश ही हुआ। यह परमेश्वर का विधान है। मानव शरीर प्राप्त प्राणी को वर्तमान जन्म में पूर्ण संत से दीक्षा लेकर भक्ति करनी चाहिए तथा पुण्य-दान, धर्म तथा शुभ कर्म अवश्य करने चाहिऐं, अन्यथा पूर्व जन्म के पुण्य मानव जीवन में खा-खर्च कर खाली होकर परमात्मा के दरबार में जाएगा। फिर पशु आदि के जीवन भोगने पड़ेंगे।
जैसे किसान अपने खेत में गेहूँ, चना आदि बीजता है। फिर परिश्रम करके उन्हें परिपक्व करके घर लाकर अपने कोठे (कक्ष) में भर लेता है। यदि वह पुनः बीज बो कर फसल तैयार नहीं करता है और पूर्व वर्ष के गेहूँ व चने को खा-खर्च रहा है तो वर्तमान में तो उसे कोई आपत्ति नहीं आएगी क्योंकि पूर्व वर्ष के गेहूँ-चना शेष है, परंतु एक दिन वह पूर्व वाला संग्रह किया अन्न समाप्त हो जाएगा और वह किसान परिवार भिखारी हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार मानव शरीर में जो भी प्राप्त
हो रहा है, वह पूर्व के जन्मों का संग्रह है। यदि वर्तमान में शुभ कर्म तथा भक्ति नहीं की तो भविष्य का जीवन नरक हो जाएगा।
अध्यात्म ज्ञान होने के पश्चात् मानव बुद्धिमान किसान की तरह प्रतिवर्ष प्रत्येक मौसम में दान-धर्म, स्मरण रूपी फसल बोएगा तथा अपने घर में संग्रह करके खाएगा तथा बेचकर अपना खर्च भी चलाएगा यानि पूर्ण गुरू जी से दीक्षा लेकर उनके बताए अनुसार साधना तथा दान-धर्म प्रति समागम में करके भक्ति धन को संग्रह करेगा। इसलिए परम संत मानव को जीने की राह बताता है। उसका आधार सत्य आध्यात्मिक ज्ञान सर्व ग्रन्थों से प्रमाणित होता है।
जैसा कि पूर्वोक्त प्रसंग में एक वृद्ध ने बताया कि सर्व संतान का पाल-पोसकर विवाह कर दिया। मेरे मानव जीवन का कार्य पूरा हुआ, मेरा जीवन सफल हुआ। अब बेशक मौत आ जाए। विचारणीय विषय है कि उसने तो पूर्व का जमा ही खर्च कर दिया, भविष्य के लिए कुछ नहीं किया। जिस कारण से उस व्यक्ति का मानव जीवन व्यर्थ गया।
कबीर जी ने कहा है कि:-
क्या मांगुँ कुछ थिर ना रहाई। देखत नैन चला जग जाई।।
एक लख पूत सवा लख नाती। उस रावण कै दीवा न बाती।।
भावार्थ:- यदि एक मनुष्य एक पुत्रा से वंश बेल को सदा बनाए रखना चाहता है तो यह उसकी भूल है। जैसे श्रीलंका के राजा रावण के एक लाख पुत्रा थे तथा सवा लाख पौत्रा थे। वर्तमान में उसके कुल (वंश) में कोई घर में दीप जलाने वाला भी नहीं है। सब नष्ट हो गए। इसलिए हे मानव! परमात्मा से यह क्या माँगता है जो स्थाई ही नहीं है। यह अध्यात्म ज्ञान के अभाव के कारण पे्ररणा बनी है। परमात्मा आप जी को आपका संस्कार देता है। आपका किया कुछ नहीं हो रहा। उस वृद्ध की बात को मानें कि पुत्रा के होने से वंश वृद्धि होने से संसार में नाम बना रहता है। एक गाँव में प्रारम्भ में चार या पाँच व्यक्ति थे। उनके वंश के सैंकड़ों परिवार बने हैं। उनका वंश चल रहा है। उनका संसार में नाम भी चल रहा है। परंतु शास्त्रोक्त विधि से भक्ति न करने के कारण परमात्मा के विधानानुसार वह भला पुरूष कहीं गधा बनकर कष्ट उठा रहा होगा। वहाँ पर गधे के वंश की वृद्धि करके फिर कुत्ते का जन्म प्राप्त करके वहाँ उस कुल की वृद्धि करके अन्य प्राणियों के शरीर प्राप्त करके असंख्यों जन्म कष्ट उठाएगा। भावार्थ है कि मानव जीवन प्राप्त प्राणी को चाहिए कि सांसारिक कर्तव्य कर्म करते-करते आत्म कल्याण का कार्य भी करे। जिस कारण से परिवार से आने वाली पूर्व पाप की मार भी टलेगी, परिवार खुशहाल रहेगा। अन्यथा शुभ-अशुभ दोनों कर्मों का फल भोगने से कभी सुख तथा कभी दुःख का कहर भी झेलना पड़ता है।
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त्रेता युग में जब रावण ने सीता जी का हरण कर लिया तो उसकी खोज शुरू हुई। हनुमान जी ने सीता पता लगाया कि वह रावण की कैद में है। सीता ने हनुमान को एक कंगन दिया था कि यह श्री राम को दिखा देना। जब वे सीता जी की खोज कर के लंका से वापिस आ रहे थे तो समुद्र को आकाश मार्ग से पार करके एक पर्वत के ऊपर उतरे। वहाँ पास ही एक बहुत सुंदर निर्मल जल का सरोवर था। सुबह-सुबह की बात है। जो कंगन सीता जी ने हनुमान को दिया था, हनुमान जी उसको एक पत्थर पर रख कर स्नान करने लगे। उसी समय एक बंदर आया और कंगन उठा कर भाग लिया। हनुमान जी की नज़र जैसे सर्प की मणि पर होती है ऐसे कंगन पर थी। हनुमान जी पीछे दौड़ा। बंदर भाग कर एक आश्रम में प्रवेश कर गया और उस कंगन को एक मटके में दाल दिया। वह बहुत बड़ा घड़ा था। जब उस कुम्भ में हनुमान जी ने देखा तो ऐसे-ऐसे कंगनों से वह घड़ा लगभग भरा हुआ था। हनुमान जी ने कंगन उठा कर देखा तो सारे ही कंगन एक जैसे थे। भेद नहीं लग रहा था। असमंजस में पड़ गया।
सामने एक महापुरुष (ऋषि) आश्रम में बैठे हुए दिखाई दिए। उनके पास जाकर प्रार्थना की कि हे ऋषिवर! मैं सीता माता की खोज करने गया था और सीता जी का पता लग गया है। एक कंगन माता ने मुझे दिया था। उसको रखकर स्नान करने लग गया। बंदर ने शरारत की और उठकर इस मटके में दाल दिया। वह ऋषि उस समय मुनिन्द्र नाम से आये कबीर साहिब थे। मुनिन्द्र साहिब ने कहा कि आओ भक्त जी, दूध पीयो, बैठो विश्राम करो। हनुमान जी बोले कि काहे का दूध, मेरी तो साड़ी म्हणत विफल हो गयी। इस कुम्भ के अंदर एक ही जैसे सभी कंगन नज़र आ रहे हैं। मुझे पहचान नहीं हो रही, वह कंगन कौन सा है ? मुनिन्द्र जी बोले कि आपको हो भी नहीं सकती। यदि पहचान हो जाय तो आप इस काल के लोक में दुखी नहीं होते, यह कठिनाइयाँ नहीं आती।
मुनिन्द्र (कबीर साहिब) जी बोले की हनुमान जी आप कौन से राम की बात कर रहे हो ? कौन सीता ? मुझे यह तो बता। हनुमान जी बोले कि आप अजीब बात कर रहे हो। सारे के सारे वन तथा संसार में एक चर्चा हो रही है। आप को मालुम ही नहीं ? भगवन रामचन्द्र जी ने राजा दशरथ के घर पर जन्म लिया है। उनकी पत्नी का रावण ने अपहरण कर रखा है, आपको नहीं मालूम ? मुनिन्द्र जी कहते हैं कि कौन-कौन से नंबर के राम की मालूम करूँ ? हनुमान जी कहते हैं की राम का भी कोई नंबर होता है ? मुनिन्द्र साहिब ने कहा की ऐसे-ऐसे यह दशरथ के पुत्र रामचन्द्र 30 करोड़ हो चुके हैं और यह सभी जन्म और मृत्यु के अंदर हैं। यह पूर्ण परमेश्वर नहीं है। यह केवल तीन लोक के प्रभु हैं। इनके उपासक भी मुक्त नहीं हैं। हनुमान जी, सत कर मानना।
हनुमान जी बहुत महसूस करता है कि यह महात्मा बहुत अजीबो गरीब बात कर रहा है। हनुमान जी बोले कि क्या यह श्री रामचन्द्र जी तीस करोड़ बार आ चुके हैं ? मुनिन्द्र (कबीर) जी ने कहा - हाँ पुत्र, यह श्री राम अपना जीवन पूरा करके जब समाप्त हो जायेगा उसके बाद फिर नई आत्मा ऐसे ही जन्म लेती रहती हैं और आती रहती हैं। ऐसे ही तेरे जैसे हनुमान न जाने कितने हो लिए। यह तो इस ब्रह्म (काल भगवान) ने एक फिल्म बना रखी है। उसमें पात्र आते रहते हैं। और इसी का प्रमाण यह कुम्भ दे रहा है। इसमें जितने भी कंगन हैं यह आप ही जैसे हनुमान आते हैं और वह बंदर इसमें कंगन डालता है। इस कुम्भ के अंदर मेरी कृपा से एक शक्ति है कि जो भी वस्तु इसमें डाली जाती है यह वैसी ही एक और बना देता है । ऐसे ही इस रूप का दूसरा कंगन तैयार कर देता है। आप इस में से कंगन ले जाइए और दिखाईये अपने राम जी को, ज्यों का त्यों मिलेगा। फिर कहा कि हनुमान जी सतभक्ति करो। यह भक्ति तुम्हारी परिपूर्ण नहीं है। यह काल जाल से आपको मुक्त नहीं होने देगी। हनुमान जी बोले कि अब मेरे पास इतना समय नहीं है कि आपके साथ वार्ता करूँ, परन्तु मुझे आपकी बातें अच्छी नहीं लग रही हैं। कंगन उठा कर चले गए।
भगवान रामचन्द्र जी रावण का वध करके सीता को वापिस ले आये।
कुछ दिनों के बाद हनुमान जी अयोध्या त्यागकर एक पहाड़ पर भजन कर रहे थे। यही दयालु परमेश्वर अपनी हंस आत्मा के पास गए तथा कहा की राम-राम भक्त जी। हनुमान जी ने ऋषि की तरफ देखा । फिर हनुमान जी बोले कि मुझे ऐसा लग रहा है कि आपको कहीं पर देखा हो। तब मुनिन्द्र साहिब बोले कि - हाँ, हनुमान। पहली बार तो तूने मुझे वहां पर देखा जब आप सीता की खोज करके वापिस आ रहे थे और कंगन को किसी बंदर ने मटके में दाल दिया था और दूसरी बार वहाँ पर देखा था जब श्री रामचन्द्र जी का समुद्र पर पुल नहीं बन रहा था। उस समय मैंने अपनी कृपा से पुल बनवाया था। मैं वही मुनिन्द्र ऋषि हूँ।
हनुमान जी को याद आया। कहा की - आओ ऋषि जी, बैठो। क्योंकि हनुमान जी बहुत प्रभु प्रेमी और अतिथि सत्कार करने वाले महापुरुष थे। कहा की अब पहचान लिया। मुनिन्द्र जी फिर प्रार्थना करते हैं कि हनुमान जी जो आप साधना कर रहे हो, यह पूर्ण नहीं है। यह तुम्हें पार नहीं होने देगी। यह सर्व काल जाल है। सारी "सृष्टि रचना" सुनाई। हनुमान जी बहुत प्रभावित होते हैं। फिर भी कहा कि मैं तो इन प्रभु से आगे किसी को नहीं मान सकता। हमने तो आज तक यही सुना है कि यह तीन लोक के नाथ विष्णु हैं और उन्हीं का स्वरुप रामचन्द्र जी आये हैं। अगर मैं आपके सतलोक को अपनी आँखों देखूं तो मान सकता हूँ।
कबीर साहिब ने हनुमान जी को दिव्य दृष्टि दी और स्वयं आकाश में उड़कर सतलोक पहुँच गए। पृथ्वी पर बैठे हनुमान जी को सब वहाँ सतलोक का दृश्य दिखाया। साथ में यह तीन लोक के भगवानों के स्थान दिखाए और वह काल दिखाया जहाँ पर एक लाख जीवों का प्रतिदिन आहार करता है। उसी को ब्रह्म, क्षर पुरुष तथा ज्योति स्वरूपी निरंजन कहते हैं। तब हनुमान जी ने कहा कि - प्रभु, नीचे आओ। क्षमा करना दास ने आपके साथ अभद्र व्यवहार भी किया होगा। दास को शरण में लो। हनुमान जी को प्रथम नाम दिया, फिर सत्यनाम दिया और मुक्ति का अधिकारी बनाया।
प्रमाण के लिए देखें - कबीर सागर, हनुमान बोध ।



